Wardha वर्धा, 18 अक्टूबर, 2026
बंगाल का दुर्गा पूजा उत्सव जगत् विख्यात है। षष्ठी से दशहरे तक पाँच दिन के इस उत्सव के दौरान बंगाली मन भी पूजा के रंग में रंग जाते हैं। वर्धा शहर में रहने वाले बंगाली परिवार द्वारा रेलवे इंस्टीट्यूट में आयोजित सार्बजनीन दुर्गा पूजा उत्सव में आप इसे अनुभूत कर सकते हैं, बंगाल के दूर्गा पूजा के मिनी दृश्य को महसूस कर सकते हैं।
षष्ठी से दसमी तक चलने वाले महापूजन का विधिवत पूजा-अर्चना कर पूजोत्सव का आरंभ किया गया। दूर्गा पूजा के अवसर पर प्रकाशित पूजा स्मारिका ‘चतुरंग’ का विमोचन भी किया गया। इस दौरान कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है- सांस्कृतिक कार्यक्रम, मूक-बधिर बच्चों के साथ महाप्रसाद का आयोजन। इस दौरान शारदा मूक-बधिर विद्यार्थियों को नि:शुल्क स्कूल बैग वितरित किया जाएगा। कार्यक्रम के आयोजन के निमित्त कई समितियां महीनों से कार्यरत हैं।
कार्यक्रम के सफलतार्थ पूजा समिति के संरक्षक अंकित कुमार मिश्र सहित असीम चक्रवर्ती, डॉ. आलोक विश्वास, एच.एन. घोष, अर्नब नाग, अनु मुखर्जी, डॉ. अनिर्बाण घोष, डॉ. अमित विश्वास, शुभाशीष चटर्जी, प्रकाश मजूमदार, प्रदीप मजूमदार, डॉ. सैकत विश्वास, दिलीप चक्रवर्ती, विमल डे, बी.एन. दास, प्रोबीर नंदी, आर.के. बर्मन, अभिषेक कुण्डू, धनंजय भट्टाचार्य, सत्यम अधिकारी आदि सहयोग प्रदान कर रहे हैं।
बंगाली दुर्गा पूजा की दो खासियत हैं – पहला, आरती के दौरान धुनुचि नाच। इस नाच में स्त्री या पुरुष अकेले या समूह में हाथ में धूपदान (आग में धूमन डालकर) लेकर कलात्मक नृत्य करते हुए भाव-विभोर हो उठते हैं। दूसरा, दशमी पर सिंदूर खेला। स्त्रियाँ माँ के चरणों में जो सिंदूर चढ़ाती हैं, सालभर वही सिंदूर इस्तेमाल करती हैं। फिर शुरू होता है प्रसिद्ध सिंदूर खेला। विवाहिताएँ परस्पर मांग व माथे पर सिंदूर लगाने के साथ ही एक-दूसरे के चेहरे पर सिंदूर लगाकर ‘सिंदूर खेला’ का आनंद उठाती हैं।
बंगाल में ‘पूजो’ का अर्थ ही है-आनंद, उत्साह और एकता। इस आनंद के साथ माँ की विदा के दुःख का स्पर्श मन को व्याकुल बना देता कि माँ हमें छोड़कर जा रही हैं परंतु मन को यही आशा सबल बनाती है कि ‘आबार एशो माँ’ यानी माँ फिर आना।
