wardha वर्धा,8 मार्च
वर्धा जिले में महिलाएं अब पारंपरिक सीमाओं को तोड़ते हुए आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं। एक समय था जब वाहन चालक का पेशा पुरुषों के वर्चस्व वाला माना जाता था। वर्धा जिले की 13 महिलाएं आज ऑटोरिक्शा चलाकर न केवल अपनी आजीविका कमा रही हैं, बल्कि समाज की पुरानी धारणाओं को भी चुनौती दे रही हैं। ये महिलाएं साबित कर रही हैं कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी काम कठिन नहीं होता।
जिले में 65 हजार महिलाओं के पास ड्राइविंग लाइसेंस है। इनमें से 416 महिलाओं के पास परिवहन संवर्ग (कमर्शियल) लाइसेंस है। 24 महिलाओं के पास ऑटोरिक्शा परमिट है, जबकि 13 महिलाएं ऑटोरिक्शा चलाकर रोजगार से जुड़ी हुई हैं। उनका ऑटोरिक्शा सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और संघर्ष की पहचान बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर इन महिलाओं की कहानी समाज को यह संदेश देती है कि महिलाएं अगर ठान लें तो हर चुनौती को पार कर सकती हैं।
दो साल से स्कूल ऑटो चला रही सरिता नांदुरकर कहती हैं कि ऑटो चलाने में पहले झिझक होती थी, क्योंकि इस क्षेत्र पर पुरुषों का वर्चस्व था। लेकिन फिर भी मैंने इस भ्रम को तोड़ने के लिए ऑटो का पेशा अपनाया। ड्राइविंग मेरा शौक भी है।
प्रादेशिक परिवहन अधिकारी स्नेह मेढे ने कहा कि वाहनों का स्टेयरिंग भी महिलाओं के हाथ में होना चाहिए। जिस तरह घर का स्टेयरिंग महिलाओं के हाथ में होता है और वह उसे पूरी जिम्मेदारी के साथ अपनी मंजिल तक ले जाती हैं, उसी तरह अगर वाहनों का स्टेयरिंग भी महिलाओं के हाथ में आ जाए तो यातायात भी नियमों के अधीन हो जाएगा। महिलाएं घर-परिवार की जिम्मेदारी बखूबी निभाती हैं, उसी तरह वे यातायात नियमों का पालन भी करेंगी और घर के सभी लोगों को उसका पालन करने के लिए समझाएंगी।
