एक साल तक जलता है दीपक नहीं सूखते फूल प्रसाद भी रहता है ताजा

  • विज्ञान के लिए अब भी सबसे बड़ा रहस्य
  • कर्नाटक राज्य का मंदिर की कहानी
  • हासन जिले में है देवी का मंदिर


अभय बेदमोहता,
wardha सेलू, 20 जनवरी
ज़रा कल्पना कीजिए कि,आपने एक कमरे में दीपक जलाया, ताज़े फूल रखे, भोजन की थाली सजाई और फिर उस कमरे को बाहर से पूरी तरह सील कर दिया। एक साल बाद जब आप कमरा खोलेंगे तो क्या नजारा दिखेगा? ज़ाहिर है की, चारों ओर मकड़ी जाले होंगे, दीपक बुझ चुका होगा और भोजन पूरी तरह से सड़ चुका होगा।लेकिन भारत में एक ऐसा स्थान है जहाँ विज्ञान के ये नियम मानो असफल हो जाते हैं। हम बात कर रहे हैं कर्नाटक के हासन ज़िले में स्थित हसनंबा मंदिर (story of Hassanamba Temple) की।


यह मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि शोधकर्ताओं के लिए भी एक अनसुलझा रहस्य है। इस मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार देखने को मिलता है मंदिर को बंद करने और एक वर्ष बाद उसे दोबारा खोलने की प्रक्रिया में। परंपरा के अनुसार, दीपावली उत्सव समाप्त होने के बाद पुजारी गर्भगृह में देवी की विधिवत पूजा करते हैं। देवी के सामने घी का नंदा दीप जलाया जाता है, सुगंधित फूलों की मालाएँ चढ़ाई जाती हैं और नैवेद्य के रूप में पका हुआ चावल रखा जाता है। इसके बाद मंदिर के भारी भरकम लकड़ी के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं,और सरकारी मुहर लगाकर मंदिर पूरे एक साल के लिए सील कर दिया जाता है।


ठीक एक साल बाद, अगली दीपावली पर जब मंदिर के दरवाज़े खोले जाते हैं, तो वहाँ मौजूद हर व्यक्ति स्तब्ध रह जाता है। एक साल पहले जलाया गया दीपक आज भी जलता हुआ मिलता है, देवी के गले में चढ़ाए गए फूल वैसे ही ताज़े और सुगंधित रहते हैं, मानो अभी-अभी चढ़ाए गए हों, और रखा गया चावल भी बिल्कुल खराब नहीं होता। एक पूरी तरह बंद जगह, जहाँ न हवा का प्रवाह है और न रोशनी फिर वहाँ यह सब कैसे संभव है? इसका उत्तर आज तक किसी के पास नहीं है। इस मंदिर से जुड़ी एक हृदयस्पर्शी पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में इस क्षेत्र में एक अत्यंत सात्विक और देवीभक्त बहू रहती थी।जो घंटों देवी की भक्ति में लीन रहती थी। उसकी सास बहुत क्रूर और क्रोधी थी। एक बार जब बहू मंदिर परिसर में प्रार्थना कर रही थी, तब सास ने क्रोध में आकर उसे ज़ोर से मारा। पीड़ा में कराहती हुई बहू ने देवी से सहायता की पुकार लगाई।

भक्त की पुकार सुनकर देवी हसनंबा प्रकट हुईं और बहू को सास के अत्याचार से मुक्त करने के लिए उस को पत्थर में परिवर्तित कर अपने चरणों में स्थान दे दिया। मान्यता है कि, वह पत्थर आज भी मंदिर परिसर में मौजूद है और हर वर्ष देवी की मूर्ति की ओर चावल के एक दाने जितना आगे बढ़ता है। इसे ‘सोसे कल्लु’ (बहू का पत्थर) कहा जाता है। लोकविश्वास है कि जिस दिन यह पत्थर देवी को स्पर्श करेगा, उस दिन कलियुग का अंत हो जाएगा।इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि, वाराणसी से आईं सात माताएँ (सप्तमातृका) इस क्षेत्र की सुंदरता से मोहित होकर यहीं निवास करने लगीं, जिनमें से तीन आज भी इस मंदिर में अदृश्य रूप में विराजमान हैं।

हसनंबा मंदिर का यह उत्सव पूरे कर्नाटक के लिए एक बड़ा पर्व होता है।जिसे ‘हसनंबा जात्रे’ कहा जाता है। आश्विन माह की पूर्णिमा के बाद आने वाले पहले गुरुवार, जिसे मन्नार गुरुवारा कहा जाता है, मंदिर के द्वार खोले जाते हैं। यह मंदिर केवल 10 से 15 दिनों के लिए ही खुलता है, इसलिए दर्शन के लिए प्रतिदिन 2 से.3 किलोमीटर लंबी कतारें लगती हैं। इस दौरान पूरा हासन शहर रोशनी से जगमगा उठता है। पारंपरिक नंदी ध्वजों की शोभायात्रा निकलती है। और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों से वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

अंतिम दिन भव्य पूजा के बाद, अगले वर्ष फिर मिलने की आशा के साथ नया दीपक और नए फूल अर्पित कर मंदिर के द्वार फिर से पूरे सालभर के लिए बंद कर दिए जाते हैं। आज के विज्ञान-प्रधान युग में भी हसनंबा देवी का यह मंदिर हमें यह याद दिलाता है कि संसार में कुछ शक्तियाँ ऐसी भी हैं, जो मानवीय समझ और तर्क से परे हैं। निसर्ग, समय और दैवी शक्ति का यह संगम सचमुच अद्भुत है।आपका क्या मानना है की.यह केवल एक अद्भुत संयोग है या हमारे पूर्वजों द्वारा निर्मित कोई रहस्यमय ऊर्जा का केंद्र?

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